Brussels Sprouts Ki Kheti Kaise Kare – ब्रुसेल्स स्प्राउट की खेती

Brussels Sprouts Ki Kheti Kaise Kare – ब्रुसेल्स स्प्राउट की उन्नत खेती कैसे करें

यह सब्जी भी गोभी वर्गीय सब्जियों में से है जिसको छोटा पत्ता गोभी (Baby Cabbage) भी कह सकते हैं । अर्थात् पौधों को वृद्धि करने के पश्चात् पत्तियों की गांठों (Nodes) से छोटे-छोटे बन्द गोभी बनते है तथा जो विकसित होकर 50-100 ग्राम तक के होते हैं । ये बन्द ही स्प्राउट कहलाते हैं जो कुछ कठोर, गोलाकार, हरे व हल्के लाल रंग के पौधों के तनों पर पत्ती के साथ से निकलते रहते हैं । इन ब्रूसेल्स-स्प्राउट्स को कच्चे सलाद के रूप में व उबाल कर भी सब्जी के रूप में खाया जाता है । इनके अन्दर पोषक-तत्वों की मात्रा अधिक होती है । विटामिनस, प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा तथा खनिज लवण आदि की अधिक मात्रा होती है । इसकी खेती उत्तरी भारत व पहाड़ी क्षेत्रों में दोनों स्थानों पर आसानी से की जा सकती है । आजकल इसकी मांग बढ़ती जा रही है । इसका बाजारीय मूल्य 300-400 रुपये प्रति किलो होता है । धीरे-धीरे इसकी खेती व्यावसायिक दृष्टि से बढ़ती जा रही है ।

Brussels Sprouts Ki Kheti Kaise Kare

ब्रुसेल्स स्प्राउट की उन्नत खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु (Soil and Climate for Brussels Sprouts Khet)

यह बलुई दोमट से लेकर हल्की चिकनी मिट्टी में उत्पन्न किया जाता है लेकिन सर्वोत्तम भूमि हल्की दोमट रहती है । जिस भूमि में जीवांश पदार्थों की मात्रा अधिक हो, ऐसी भूमि में खेती सफलतापूर्वक की जाती है ।

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खेत की तैयारी (Land Preparation)

जुताई भूमि की किस्मों के आधार पर करनी चाहिए । हल्की भूमि में 2-3 जुताई पर्याप्त होती हैं । लेकिन हल्की चिकनी भूमि में 4-5 जुताइयों की आवश्यकता पड़ती है । जुताइयां, मिट्‌टी पलटने वाले हल या ट्रैक्टर हैरों से दो जुताई करके दो जुताई ट्रिलर या देशी हल से करें जिससे मिट्‌टी ढेले रहित व भुरभुरी हो जायें ।

उन्नत किस्में (Improved Varieties)

ब्रूसेल्स स्प्राउट की प्रमुख किस्में निम्नलिखित हैं-

i. एक्सप्रैस ii. स्वीडन iii. अर्ली ड्वार्फ iv. डेनिश प्राइज v. लांग आइसलैंड vi. हिल्ज आइडियल तथा स्थानीय कोई भी किस्म उगाई जा सकती है ।

बीज की मात्रा (Seeds Rate)

ब्रूसेल्स स्प्राउट का बीज अन्य गोभी की भांति 500-600 ग्राम. प्रति हैक्टर पर्याप्त होता है ।

बुवाई का समय (Sowing Time)

बुवाई का समय सितम्बर से आरम्भ हो जाता है लेकिन सर्वोत्तम समय अक्टूबर से नवम्बर का माह होता है । इस समय उत्तरी भारत के लिये तथा पहाड़ी क्षेत्रों के लिये मार्च-अप्रैल का माह सर्वोत्तम रहता है ।

पौध तैयार करना (Preparation of Seedling)

बीज की बुवाई पौधशाला में करते हैं । बीज के लिये क्यारियां 1 मी. चौड़ी तथा 5 मी. लम्बी 4-5 क्यारियां बनाते हैं । इनमें खाद व उर्वरक की उचित मात्रा देकर मिट्टी भुरभुरी कर लेते हैं तथा इन क्यारियों में बीज बोने के लिये पंक्तियां 3-4 सेमी. की दूरी पर बनाते हैं तथा बीज 1-2 मिमी. की दूरी पर बोते हैं । तत्पश्चात् बीज को बारीक कम्पोस्ट या पत्ती की खाद से ढक कर पानी देते हैं । आवश्यकतानुसार नमी बनाये रखने पर 6-8 दिन में बीज अंकुरित हो जाता है तथा 20-25 दिन में पौध रोपाई के योग्य हो जाती है ।

खाद एवं उर्वरकों की मात्रा (Quantity of Manure and Fertilizers)

खेत में उत्तम उपज के लिये 10-12 टन सड़ी गोबर की खाद तथा उर्वरकों में नत्रजन 80-100 किलो, फास्फोरस 60-80 किलो एवं पोटाश 50-60 किलो प्रति हैक्टर खेत तैयारी के समय देना चाहिए लेकिन नत्रजन की आधी मात्रा रोपाई के 20 दिन बाद टोप-ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए जिससे पौधों में अच्छी वृद्धि होती है ।

पौध की रोपाई एवं दूरी (Transplanting and Distance)

पौध जब तैयार होकर 8-10 सेमी. की हो जाये तो तैयार खेत या क्यारियों में रोपित करना चाहिए । पौधों की रोपाई करते समय पौधों की व पंक्तियों की आपस की दूरी का विशेषत: ध्यान रखना चाहिए अर्थात् पौधे से पौधे की दूरी 45 सेमी. तथा पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सेमी. रखनी चाहिए । जिससे पौधे अच्छी वृद्धि कर सकें । सम्भवत: पौधों को सायंकाल में ही रोपना चाहिए धूप में नहीं अन्यथा पौधे मुरझाकर मर जाते हैं । रोपन के तुरन्त बाद सिंचाई करनी चाहिए ।

सिंचाई करना (Irrigation)

प्रथम सिंचाई पौध रोपने के तुरन्त बाद ही करनी चाहिए तथा अन्य सिंचाई शरद ऋतु की फसल होने के कारण 10-12 दिन के अन्तर पर करनी उत्तम रहती है । इस प्रकार से 6-7 सिंचाइयां पर्याप्त रहती हैं ।

निकाई-गुड़ाई (Hoeing)

सिंचाई करने के पश्चात् फसल में कुछ अन्य जंगली पौधे व घास उग आती हैं जिन्हें खरपतवार भी कहते हैं । इनको निकालना ही खरपतवार-नियन्त्रण या रोकथाम कहलाता है । जिसके लिये 3-4 बार निकाई-गुड़ाई करना चाहिए तथा इसी समय पौधों पर हल्की मिट्‌टी भी चढ़ा देना उचित होता है ।

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स्प्राउट्स की कटाई (Harvesting)

इन बन्दो (Sprouts) को उचित समय पर तोड़ना या काटना आवश्यक है । अर्थात् जब ये बन्द 3-4 सेमी. की मोटाई के गोलाई में हो जाएं तो इन्हें परिपक्व या खाने योग्य समझकर काटना चाहिए । इस प्रकार से ये बन्द धीरे-धीरे वृद्धि करते रहते हैं तथा जैसे-जैसे बन्द उचित मोटाई व गोलाई के हो जाएं तो तोड़ते रहना चाहिए तथा बिक्री हेतु भेजना चाहिए ।

उपज (Yield)

इन ब्रुसेल्स-स्प्राउट्स की उपज उचित कृषि-क्रियाओं को पूर्णत: करने के पश्चात् प्रति पौध 800-1000 ग्राम प्राप्त होती है यदि पूरा खेत अच्छी प्रकार से तैयार किया है तो प्रति हैक्टर 1500-2000 क्विंटल उपज तक हो जाती है । यह सब्जी अधिक महंगी होने से बाजार में कम मिलती है तथा बाजार में इसका मूल्य 250-300 रुपये प्रति किलो तक मिलता है । मूल्य मांग पर भी निर्भर करता है ।

बीमारियां एवं कीट (Diseases and Insect)

बीमारियों हेतु मुख्यत: बेवस्टीन, ब्लाइटॉक्स, डाइथेन जेड- 78 का प्रयोग करते हैं क्योंकि बीमारी पाउडरी मिल्डयू अधिकतर लगती है ।

कीट नियन्त्रण हेतु- रोगोर, मेलाथियोन, मेटासीड का प्रयोग करने से कीटों की रोकथाम हो जाती है ।

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