देवप्रयाग का इतिहास और यात्रा Devprayag Uttrakhand History Yatra In Hindi

देवप्रयाग का इतिहास और यात्रा Devprayag Uttrakhand History Yatra In Hindi

प्रयाग राज के बाद देवप्रयाग को महत्वपूर्ण माना जाता है। नारदपुराण और स्कन्दपुराण में देवप्रयाग का उल्लेख मिलता है। ऋषिकेश-बदरीनाथ मोटर मार्ग पर यह तीर्थ स्थान भागीरथी व अलकनंदा के संगम पर स्थित है।

सतयुग में देव शर्मा नामक प्रसिद्ध मुनि ने दस हजार वर्ष तक पत्ते खाकर व एक हजार वर्ष तक एक पैर पर खड़े होकर देवप्रयाग में विष्णु की तपस्या की थी। भक्ति से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और कहा कि वर मांगो मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं। मुनि देव शर्मा ने कहा कि भगवान हमारी प्रीति आपके चरणों मे रहे और यह पवित्र क्षेत्र कलियुग में संपूर्ण पापों का नाश करने वाला हो, आप सदा इस क्षेत्र मे निवास करें और जो व्यक्ति इस क्षेत्र में आपकी पूजा-अर्चना करे वह परमगति को प्राप्त हो ।

भगवान विष्णु ने कहा-ऐसा ही होगा। मैं त्रेतायुग में दशरथ के पुत्र राम के नाम से विख्यात होऊंगा और रावण आदि राक्षसों को मारकर कुछ समय अयोध्या का राज-काज चलाकर यहीं आऊगा, तब तक तुम इसी स्थान पर निवास करो। भगवान इसके बाद अंतर्धान हो गए और देव शर्मा वहां रहने लगे।

त्रेतायुग आने पर भगवान विष्णु ने दशरथ पुत्र राम के रूप में जन्म लिया और रावण को मारकर अयोध्या में कुछ समय बिताकर यहां आकर दर्शन दिए और कहा कि -‘‘हे मुनि! तुम्हें सीधे मोक्ष प्राप्त होगा और यह स्थान तीनों लोकों में प्रसिद्ध होगा।” ऐसा कहकर राम, सीता तथा लक्ष्मण इस स्थान पर निवास करने लगे। इसी देव शर्मा मुनि के कारण इसका नाम देवप्रयाग पड़ा।

देवप्रयाग का मुख्य मंदिर रघुनाथ मंदिर है। मंदिर के शिखर पर सोने का कलश है। शिखर के नीचे गर्भगृह में भगवान राम की विशाल मूर्ति है। जिनके दोनों चरणों तथा हाथों पर आभूषण व सिर पर सोने के मुकुट हैं। हाथों में धनुषबाण और कमर में ढाल लिए हैं। उनके एक तरफ सीता जी और दूसरी तरफ उनके भ्राता लक्ष्मण की मूर्ति है। मंदिर के बाहर गरुड़ की पीतल की मूर्ति है। मंदिर के दाहिनी ओर बदरीनाथ, महादेव व कालभैरव हैं।

संगम के उत्तर में गंगा के किनारे वाराह शिला, वेताल शिला, वशिष्ट तीर्थ, पौष्पमाल तीर्थ, विल्व व सूर्य तीर्थ, भरत जी का मंदिर आदि हैं। संगम के पूर्व में तुंडीश्वर महादेव हैं। अलकनंदा के किनारे एक पवित्र कुंड है। कहा जाता है कि तुंडा नामक भीलनी ने यहां लंबे समय तक शिवजी का तप किया था। शिवजी ने उसे दर्शन दिए और तुंडीश्वर नाम से प्रसिद्ध हो गए।

पौष्पमाल तीर्थ के बारे में कहा गया है कि जब विश्वामित्र हिमवान पर्वत पर तपस्या कर रहे थे तो इन्द्र आदि देवताओं ने पुष्पमाला नामक किन्नरी को उनके तप में विध्न पैदा करने के लिए भेजा। पुष्पमाला ने विश्वामित्र पर कामदेव का कुसुम बाण छोड़ा जिससे विश्वामित्र का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने पुष्पमाला को श्राप दिया कि तू मकरी हो जाए। पुष्पमाला के याचना करने पर विश्वामित्र ने कहा कि तू कुछ समय तक देवप्रयाग में निवास कर। त्रेता युग में भगवान राम लक्ष्मण के साथ तुझे मुक्ति देंगे। जब त्रेतायुग में राम लक्ष्मण के साथ देवप्रयाग आए और गंगा में स्नान करने लगे तो मकरी उनकी और झपटी तब रामचंद्रजी ने उसका सिर काट डाला। सिर काटते ही एक अप्सरा प्रकट हुई और भगवान राम की स्तुति करने लगी। तब भगवान राम ने कहा आज से यह पौष्पमाला तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध होगा। यहां पूजा-अर्चना, स्नानादि करने वालों पर मैं प्रसन्न होऊंगा। इस स्थान पर पितरों का तर्पण करने से वे सहज ही स्वर्ग को प्राप्त हो जाएंगे ।

वेताल तीर्थ के ऊपर सूर्य तीर्थ है जिसमें स्नान करने से कुष्ठ रोग से मुक्ति मिलती है। मेघतिथि नामक ब्राह्मण ने यहां प्राचीन समय में सूर्य भगवान की तपस्या की थी। उससे प्रसन्न होकर भगवान सूर्य ने वर मांगने की कहा, तब ब्राह्मण बोला, हे प्रभु, आप इस तीर्थ में निवास कर इसे तीनों लोकों में विख्यात करो। सूर्य ने कहा ऐसा ही होगा। मान्यता है कि माघ सुदी सप्तमी के दिन सूर्य कुंड में स्नान करने से मनुष्य लम्बे समय तक सूर्य लोक में रहता है।

जब वामन भगवान ने सम्पूर्ण भूमंडल को तीन कदमों में नापा था । उस समय उनके चरण के नख से जल की धारा बह निकली जो ध्रुव मंडल और सप्तऋषि मंडल होती हुई मेरु पर्वत पर गिरी और 4 भागों में बंट गयी। जिसकी एक धारा की शिव की जटाओं में राजा भगीरथ लाए जो भागीरथी कहलायी और दूसरी धारा अलकापुरी होती हुई आई और अलकनंदा कहलाई। दोनों देवप्रयाग में आकर मिल गयी। यही संगम मोक्ष प्रदान करता है।