शिष्टाचार पर निबंध Essay On Etiquettes And Manners In Hindi

शिष्टाचार पर निबंध Essay On Etiquettes And Manners In Hindi Language

एक व्यक्ति नौकरी के लिए साक्षात्कार में सम्मिलित हुआ, उसकी नियुक्ति की संभावना अधिक थी, क्योंकि उसके पास पद के अनुकूल पर्याप्त शैक्षिक योग्यता थी | किन्तु, साक्षात्कार के बाद निकले परिणाम में अपना नाम न देखकर उसे आश्चर्य हुआ | उसमें संस्थान के प्रबंधक से इस बारे में बात की | प्रबंधक ने जवाब दिया कि वास्तव में आपके पास पद के अनुकूल शैक्षिक उपाधियां तो हैं, किन्तु आपने अभी तक भी उपयुक्त व्यवहार करना नहीं सीखा है | साक्षात्कार के दौरान ही नियोक्ता को यह आभास हो गया था कि वह व्यक्ति अत्यधिक घमंडी एवं अशिष्ट है | इसलिए उपयुक्त शैक्षिक योग्यता के रहते हुए भी उसे नियुक्त नहीं किया गया | इस तरह स्पष्ट है कि किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए व्यक्ति का आचरण सही होना चाहिए | व्यक्ति का जैसा आचरण होगा, उसी के अनुकूल उसे परिणाम भी प्राप्त होगा | कोई व्यक्ति कम योग्यता रखते हुए भी कम समय में अपने सदआचरण एंव व्यवहार कुशलता के कारण सफलता की सीढ़ियां तेजी से चढ़ सकता है और कोई अत्यधिक उपाधियों से युक्त होने के बावजूद भी जीवन भर असफल ही रह सकता है | इसलिए अंग्रेजी में कहा गया है- “इट इज योर एटीट्यूड, मोर दैन योर एप्टीट्यूड, दैट डिटरमाइन्स योर एल्टीट्यूड”, अर्थात “आपकी योग्यता से कहीं अधिक आपका व्यवहार आपकी ऊंचाई को निर्धारित करता है |”

‘शिष्टाचार’ दो शब्दों ‘शिष्ट’ एंव ‘आचार’ के मेल से बना है | शिष्ट का अर्थ होता है- सभ्य, उचित अथवा सही तथा आचार का अर्थ होता है- व्यवहार | व्यक्ति को हर समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह किससे बात कर रहा है, कहां बात कर रहा है एंव क्यों बात कर रहा है | उदाहरण के तौर पर पति-पत्नी यदि सार्वजनिक स्थल पर सबके सामने अंतरंग बातें करते हैं, तो इसे अशिष्टता ही कहा जाएगा | सामान्य व्यवहार ही नहीं बातचीत करने के ढंग से भी व्यक्ति के व्यवहार का पता चल जाता है | इसलिए किसी भी बातचीत में शिष्टाचार के सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए | बातचीत करते हुए हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हम किससे बात कर रहे हैं | बड़ों से बात करते हुए हमें आदरसूचक शब्दों का प्रयोग करना ही चाहिए |

सार्वजनिक स्थल पर धूम्रपान, किसी व्यक्ति से गाली-गलौज, अपने साथियों से अकड़कर बात करना, राह चलते किसी से बिना-वजह झगड़ना इत्यादि अशिष्ट आचरण के उदाहरण हैं | बड़ों का आदर-सम्मान करना, अपने मित्रों एंव सहयोगियों के प्रति सहयोगात्मक रवैया, छोटों के प्रति स्नेह की भावना, सकरात्मक विचारधारा, स्थान-विशेष के अनुकूल व्यवहार इत्यादि शिष्टाचार के उदहारण हैं | शालीनता एवं विनम्रता शिष्टाचार के ही घटक हैं |

प्रायः संस्कृति में अंतर के कारण भी शिष्टाचार एवं सामान्य व्यवहार में अंतर होता है | पश्चिमी देशों में जिसे सामान्य व्यवहार कहा जाता है, वह आवश्यक नहीं कि भारत में भी सामान्य ही माना जाए | पश्चिमी देशों में खुलेआम लोग अपने प्रेम का प्रदर्शन करते दिखते हैं | वहां सार्वजनिक स्थलों पर प्रेमी जोड़े को एक-दूसरे से प्रेमलाप में लिप्त दिखना सामान्य बात है | किन्तु, भारतीय सभ्यता-संस्कृति इस बात की कतई अनुमति नहीं देती |

कोई व्यक्ति अपने घर पर जिस तरह अपनी इच्छानुसार रहता है, उस तरह उसे बाहर रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती है | सार्वजनिक स्थलों पर रहते हुए भी इस बात का ध्यान रखना पड़ता है कि हमारा कोई आचरण अशिष्ट न हो | बस, ट्रेन या किसी गाड़ी में सफर करते समय धूम्रपान करना अशिष्टता की निशानी है | ऐसा करते वक्त लोग इस बात का ध्यान नहीं रखते कि इससे किसी अन्य यात्री को तकलीफ भी हो सकती है | किसी विद्यालय, महाविद्यालय अथवा कार्यालय में व्यक्ति का व्यवहार संस्थान के नियमों के अनुकूल होना चाहिए |

अशिष्ट आचरण युद्ध, झगड़े एंव गलतफहमी का कारण बनता है | अशिष्ट आचरण के परिणामस्वरुप व्यक्ति अपने उद्देश्य में असफल हो सकता है | यदि दुकानदार अपने ग्राहकों से अशिष्टता करे, तो उसके यहां आने वाले ग्राहकों की संख्या निस्संदेह कम होती चली जाएगी और एक दिन ऐसा भी हो सकता है कि उसे अपनी दुकान ही बंद करनी पड़े | यदि विद्यालय में शिक्षक का आचरण सही न हो, तो इसका दुष्प्रभाव छात्रों पर भी पड़ सकता है | और, ऐसी स्थिति में कोई भी समझदार प्राचार्य या विद्यालय प्रबंधक ऐसे शिक्षक को अपने संस्थान में रहने नहीं देना चाहेगा | इस तरह, यदि कर्मचारी कार्यालय में अपने संस्थान के नियमानुकूल व्यवहार न करें तो उसे उसकी नौकरी से वंचित किया जा सकता है |

शिष्टाचार व्यक्ति को अनुशासन की प्रेरणा देता है | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है | अनुशासन के बिना किसी भी समाज में अराजकता का माहौल व्याप्त होना स्वाभाविक है | इसी तरह एक परिवार के सदस्य यदि अनुशासित न हों, तो उस परिवार का अव्यवस्थित होना स्वाभाविक है | सरकारी कार्यालयों में यदि कर्मचारी अनुशासित न हो, तो वहां भ्रष्टाचार का बोलबाला हो जाएगा | अनुशासन न केवल व्यक्तिगत हित बल्कि सामाजिक हित के दृष्टिकोण से भी अनिवार्य है | किन्तु, वही मनुष्य अनुशासित रह सकता है, जो शिष्टाचारी हो |

व्यक्ति को शिष्ट आचरण की शिक्षा अपने घर, परिवार, समाज एवं स्कूल से मिलती है | बच्चे का जीवन उसके परिवार से प्रारंभ होता है | यदि परिवार के सदस्य गलत आचरण करते हैं, तो बच्चा भी उसी का अनुसरण करेगा | परिवार के बाद बच्चा अपने समाज एंव स्कूल से सीखता है | यदि उसके साथियों का आचरण खराब होगा तो उससे उसके भी प्रभावित होने की पूरी संभावना बनी रहेगी | यदि शिक्षक का आचरण गलत है, तो बच्चे कैसे सही हो सकते हैं | इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे अनुशासित हो, तो इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने आचरण में सुधार लाकर स्वयं अनुशासित रहते हुए बाल्यकाल से ही बच्चों में अनुशासित रहने की आदत डालें | वही व्यक्ति अपने जीवन में अनुशासित रह सकता है, जिसे बाल्यकाल में ही अनुशासन की शिक्षा दी गई हो | बाल्यकाल में जिन बच्चों पर उनके माता-पिता लाड-प्यार के कारण नियंत्रण नहीं रख पाते वही, बच्चे आगे चलकर अपने जीवन में कभी सफल नहीं हो पाते | अनुशासन के अभाव में कई प्रकार की बुराइयां समाज में अपनी जड़ें विकसित कर लेती हैं | छात्रों के नित्य-प्रति होने वाले विरोध-प्रदर्शन, परीक्षा में नकल, शिक्षकों से बदसलूकी अनुशासनहीनता के ही उदाहरण हैं | इसका खामियाजा उन्हें बाद में जीवन की असफलताओं के रूप में भुगतना पड़ता है, किन्तु जब तक वे समझते हैं तब तक देर हो चुकी होती है | इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति शिष्टाचार का पालन करे | क्योंकि एक व्यक्ति का व्यवहार एंव आचरण ही दूसरे लोगों में उसके प्रति दृष्टिकोण निर्धारित करता है | इस प्रकार शिष्टाचार सफलता का मापदंड भी है |