जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय Jaiprakash Narayan Biography in Hindi

जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय Loknayak Jaiprakash Narayan Biography in Hindi

Jaiprakash Narayan Biography In Hindi

नाम : जयप्रकाश नारायण
पिता का नाम : हरसूदयाल
मां का नाम : फूल रानी देवी
जन्म : 11 अक्टूबर 1902
जन्मस्थान : सिताबदयारा, सारण, बिहार
मृत्यु : 8 अक्टूबर 1979
उपलब्धियां : 1965 का मैग्सेसे पुरस्कार, 1998 में ‘भारत रत्न’ (मरणोपरांत)

महात्मा गाँधी के आदर्शों से प्रेरित जयप्रकाश नारायण एक ऐसे स्वतन्त्रता सग्राम सेनानी थे जिन्होने अहिंसा का सिद्धान्त नए विचार के साथ अपनाते हुए अल्पसंख्यकों की समस्या का हल निकाला और टकराव दूर करने की स्थितियाँ बनाई भारत और पाकिस्तान के कश्मीर को लेकर विवाद के रास्ते में जयप्रकाश नारायण ने एक समझदारी भरा संधि प्रस्ताव सामने रखा जिस पर सोच-विचार शुरू हुआ | इसी तरह नागालैण्ड की अलग राज्य की माँग को लेकर विद्रोही नागाओं का हृदय परिवर्तन करने में जयप्रकाश नारायण का योगदान रहा जिससे भारतीय अधिकारियों के साथ बातचीत सम्भव हो सकी । चीन द्वारा अधिनायकवाद लादे जाने के विरोध में तिब्बतियों के मामले में भी जयप्रकाश नारायण ने समझदारी भरी सक्रिय भूमिका निभाई और आगे बढ्‌कर देश के लोगों को उस सन्दर्भ में सचेत किया | आधुनिक भारत के निर्माण में जनचेतना जगाने और रचनात्मक सगंठन तैयार करने की अदूभुत क्षमता का उदाहरण सामने लाने के लिए जयप्रकाश नारायण को वर्ष 1965 का मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया |

जयप्रकाश नारायण का जीवन परिचय Jaiprakash Narayan Ka jeevan Parichay

जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को उत्तर प्रदेश तथा बिहार की सीमा पर बसे सिताबदयारा में हुआ था, जहाँ, गंगा तथा सरयू नदियों का संगम होता है । जयप्रकाश नारायण के पिता हरसूदयाल राज्य सरकार के नहर विभाग में काम करते थे और उनका काम प्राय: दौरों पर बाहर रहने से सम्बन्धित था । गाँव में कोई हाई स्कूल न होने की स्थिति में जयप्रकाश नारायण पढ़ाई के लिए पटना आ गए ।

पटना में वह अपने रिश्तेदारों की देखरेख में एक छात्रावास में रहे, जो सरस्वती भवन कहलाता था । वह एक मेधावी छात्र थे और उन्होंने हाईस्कूल विशेष योग्यता के साथ पास किया था जिसके आधार पर सरकारी छात्रवृत्ति लेकर उन्हें पटना कॉलेज में प्रवेश मिला था । जयप्रकाश नारायण का छात्रावास सरस्वती भवन राजनैतिक गतिविधियों का अड्डा था । राष्ट्रीय भावनाओं की लहर पूरे देश में तेज हो रही थी और सरस्वती भवन में गाँधी, बालगंगाधर तिलक तथा अरविंद घोष आदि के भाषणों पर चर्चा हुआ करती थी ।

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1919 में गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन से जयप्रकाश नारायण का जुड़ाव हुआ और उन पर मौलाना अबुल कलाम आजाद के भाषण का गहरा प्रभाव पड़ा । जिसमें उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा की खिलाफत की बात कही थी । इस बात के प्रभाव में आकर जयप्रकाश नारायण ने उस समय कॉलेज छोड़ दिया, जब उनकी परीक्षा के बस बीस दिन बाकी रह गए थे । पटना कॉलेज छोड्‌कर उन्होंने कांग्रेस द्वारा संचालित बिहार विद्यापीठ में प्रवेश लिया । लेकिन चौराचौरी आन्दोलन के हिंसक हो जाने के कारण उसे रोक दिया गया और विद्यापीठ भी छिन्न-भिन्न हो गया । विद्यार्थी निराश होकर कॉलेजों की तरफ लौटे । विद्यापीठ के पास कोई व्यवस्था नही बची तो जयप्रकाश नारायण ने पढ़ाई के लिए अमरीका जाने का निश्चय किया । इस बीच अक्टूबर 1920 को उनका विवाह प्रभावती से हो चुका था । प्रभावती एक प्रसिद्ध राष्ट्रवादी वकील ब्रज किशोर प्रसाद की बेटी थी और स्वयं भी गांधीवादी विचारों से बेहद प्रभावित थी । जयप्रकाश नारायण के पढ़ाई के लिए अमेरिका प्रवास के दौरान प्रभावती ने महात्मा गाँधी के आश्रम में रहने का निर्णय लिया ।

जयप्रकाश नारायण का अमरीका में प्रवास बहुत-सी कठिनाई भरे अनुभवों भरा रहा । आर्थिक कारण से उन्हें बार-बार यूनिवर्सिटी बदलनी पड़ी । इसी दौरान जयप्रकाश नारायण गुजारे के लिए अंगूरों को डिब्बाबंद करने की फैक्टरी में पैकिंग का काम करते थे । उन्होंने जूठे बर्तन धोये, एक गैराज में मैकेनिक का काम भी उन्होंने पूरे मनोयोग से किया ताकि पढ़ाई के लिए पैसा जुटा सकें । अमेरिका में जयप्रकाश नारायण ने समाजशास्त्र पढ़ा तथा इस विषय पर उनका पर्चा ‘सोशल वेरियेशन’ साल का सर्वश्रेष्ठ पर्चा घोषित किया गया, जो समाज के बदलाव का अध्ययन प्रस्तुत करता था । विस्कोसिन में जयप्रकाश नारायण को कार्ल मार्क्स की किताब ‘दास कैपिटल’ पढ़ने का मौका मिला जिससे वह मार्क्सवाद से बेहद प्रभावित हुए, लेकिन वह अपनी डाक्टरेट पूरी नहीं कर सके और नवम्बर 1929 में उन्हें अपनी माँ की बीमारी की खबर पाकर वापस भारत आना पड़ा ।

जयप्रकाश नारायण की कम्यूनिज्म में आस्था थी जबकि प्रभावती गाँधी की दृढ़ पक्षधर थीं । जवाहरलाल नेहरू की पेशकश पर जयप्रकाश नारायण ने 1929 में कांग्रेस की सदस्यता ले ली लेकिन केवल राजनैतिक आजादी जयप्रकाश नारायण का लक्ष्य नहीं था । वह भूख, गरीबी तथा अशिक्षा से मुक्ति को असली आजादी मानते थे ।

1930 में जब बहुत से कांग्रेसी नेता गिरफ्तार किए जा रहे थे, तब जयप्रकाश नारायण ने भूमिगत होकर कांग्रेस वर्किंग कमेटी का कामकाज जारी रखा । उस समय सभी गुप्त मीटिंग तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी का कामकाज जयप्रकाश नारायण के गुप्त अड्डे से होता था, लेकिन एक बार ऐसे ही बनारस में एक मीटिंग के दौरान जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार हो गए और उन्हें 1933 तक जेल में रहना पड़ा ।

जयप्रकाश नारायण ने कई-कई बार जेल की सजा भोगी क्योंकि वह ब्रिटिश सरकार को उखाड़ फेंकने के काम में लगे हुए थे । एक बार जेल से भागकर नेपाल चले गए जहाँ उन्होंने ‘आजाद दस्ता’ के नाम से एक गोरिल्ला फौज का गठन किया लेकिन ब्रिटिश सरकार ने इन्हें पकड़ ही लिया । तब इन्हें रावलपिण्डी के रास्ते लाहौर लाया गया और गम्भीर यातनाएँ दी गईं । यह सोलह महीनों तक लाहौर के किले में बन्द रहे और एकाकी कैद के साथ-साथ बहुत सी शारीरिक तथा मानसिक प्रताड़ना झेलते रहे । आखिर 12 अप्रैल 1946 को उन्हें रिहा किया गया ।

भारत की आजादी के बाद 1952 के चुनाव में समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के आगे हार का मुँह देखना पड़ा लेकिन नेहरूजी ने जयप्रकाश नारायण को मंत्रिमण्डल में आने का अवसर दिया । यह जयप्रकाश नारायण के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर था लेकिन जयप्रकाश नारायण के पास उनका एक चौदहसूत्री कार्यक्रम था जिसमें संविधान में सुधार, प्रशासन तथा न्याय व्यवस्था में सुधार, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, भूमिहीनों को जमीन देने का प्रस्ताव था । जयप्रकाश स्वदेशी नीति को आगे लाना चाहते थे और उनकी योजना सहकारी इकाइयों के गठन की थी । जवाहरलाल नेहरू इन प्रस्तावों को लागू करने की दिशा में कोई ठोस उत्तर देने के पक्ष में नहीं दिखे, तो जयप्रकाश नारायण ने मंत्रिमंडल में जाने से इंकार कर दिया ।

जयप्रकाश नारायण सरकार, मंत्रिमंडल तथा संसद का हिस्सा नहीं रहे, लेकिन उनकी राजनैतिक सक्रियता बराबर बनी रही । इन्होंने ट्रेड यूनियन के अधिकारों के लिए संघर्ष किया तथा यह कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन, पेंशन, चिकित्सा-सुविधा तथा घर बनाने के लिए सहायता जैसे जरूरी मुद्दे लागू कराने में सफल हुए । आजादी के बाद के दौर में जयप्रकाश नारायण की नजर रूस की ओर थी और उन्हें समझ में आ गया था कि कम्युनिज्म भारत के लिए सही राह नहीं है । अपने जीवन की एक महत्त्वपूर्ण घटना के तौर पर 19 अप्रैल 1954 को जयप्रकाश नारायण ने एक असाधारण-सी घोषणा कर दी । उन्होंने बताया कि वह अपना जीवन विनोबा भावे के सर्वोदय आन्दोलन को अर्पित कर रहे हैं । उन्होंने हजारीबाग में अपना आश्रम स्थापित किया जो कि पिछड़े हुए गरीब लोगों का गांव था । यहाँ जयप्रकाश नारायण ने गाँधी जी के जीवन-दर्शन को आधुनिक पाश्चात्य लोकतन्त्र के सिद्धान्त से जोड़ दिया । इसी विचार की उनकी पुस्तक ‘रिकंस्ट्रक्शन ऑफ इण्डियन पॉलिसी’ प्रकाशित हुई । इस पुस्तक ने जयप्रकाश को मैग्सेसे पुरस्कार के लिए चुने जाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।

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1971 के वर्ष में जयप्रकाश नारायण ने नक्सली समस्या का समाधान निकाल कर तथा चम्बल में डाकुओं के आत्मसमर्पण में अगुवा की भूमिका निभाई । 8 अप्रैल 1974 को 72 वर्ष की आयु में एक अदभुत नेतृत्व क्षमता तथा सचेत गतिविधि का प्रदर्शन किया । उस साल देश बेहद मंहगाई, बेरोजगारी तथा जरूरी सामग्री के अभाव से गुजर रहा था । इसके विरोध में जयप्रकाश नारायण ने एक मौन जुलूस का आयोजन किया जिस पर लाठी चार्ज किया गया । 5 जून 1974 को पटना के गाँधी मैदान में एक जनसभा को संबोधित करते हुए जयप्रकाश नारायण ने कहा, ‘यह एक क्रान्ति है, दोस्तो! हमें केवल एक सभा को भंग नही करना है, यह तो हमारी यात्रा का एक पड़ाव भर होगा । हमें आगे तक जाना है । आजादी के सत्ताइस बरस बाद भी देश भूख, भ्रष्टाचार, महँगाई, अन्याय तथा दमन के सहारे चल रहा है । हमें सम्पूर्ण क्रान्ति चाहिए उससे कम कुछ नहीं…’

12 जून 1975 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रधान मन्त्री इन्दिरा गाँधी को चुनाव में भ्रष्ट तरीके अपनाने का दोषी पाया और आदेश दिया कि इंदिरा गाँधी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक अपने पद से त्यागपत्र दे दें । लेकिन इन्दिरा गाँधी ने ऐसा करने के बजाए इमरजेंसी घोषित कर दी तथा जयप्रकाश नारायण को चंडीगढ़ के एक अस्पताल में कैद कर दिया ।

वर्ष 1977 को इमरजेंसी उठाई गई और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बहुत सी पार्टियों ने संगठित होकर एक जनता पार्टी बनाई और इस जनता पार्टी ने इन्दिरा गाँधी की कांग्रेस पार्टी को हराकर बहुमत से सत्ता हासिल की । जनता पार्टी की इस विजय में उसके चुनाव घोषणा पत्र का बड़ा हाथ था, जिसमें जयप्रकाश नारायण के लक्ष्यों को सामने रखा गया था ।

8 अक्टूबर 1979 को जयप्रकाश नारायण ने इस संसार से विदा ली । उन्हें लोकनायक जयप्रकाश नारायण के रूप में याद किया जाता है ।

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