महाश्वेता देवी का जीवन परिचय Mahasweta Devi Biography In Hindi

Mahasweta Devi Biography In Hindi

महाश्वेता देवी का जीवन परिचय (Mahasweta Devi Biography In Hindi Language)

Mahasweta Devi Biography In Hindi

नाम : महाश्वेता देवी
पिता का नाम : मनीष घटक
माता का नाम : धारिणी देवी
जन्म : 14 जनवरी 1926
जन्मस्थान : ढाका (बांग्ला देश)
उपलब्धियां : साहित्य अकादमी पुरस्कार (1979), पद्‌मश्री (1986), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1996), मैग्सेसे पुरस्कार (1997), पद्‌मविभूषण (2006) |

साहित्य में रचनात्मक लेखन तथा सक्रिय जन आन्दोलन के माध्यम से स्त्री अधिकारों, दलितों तथा आदिवासियों के हित में रहने वालों में महाश्वेता देवी का नाम लिया जाता है । कहानियों और उपन्यासों के जरिये साहित्य में स्थापित महाश्वेता देवी ने बिहार, मध्यप्रदेश, तथा छतीसगढ़ जैसे आदिवासियों के इलाकों में पैदल घूम-घूम कर उनके जीवन को समझा और उनकी यातना को मुख्य धारा का विषय बनाया | अन्याय, शोषण तथा दमन के शिकार आदिवासियों, दलितों, तथा स्त्रियों का दर्द महाश्वेता देवी ने समझा और व्यवस्था से संघर्षपूर्वक उनके हित में सुविधाएँ तथा न्याय जुटाया | महाश्वेता देवी ने इस वर्ग को समझदार तथा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी काम किया । सरकारों की रोजगार तथा उद्योग नीतियों की खिलाफत की और इनके पक्ष में खड़ी हुईं तथा जनमत जुटाया । महाश्वेता देवी को कला, साहित्य तथा आन्दोलन के जरिये आदिवासियों की स्थिति उजागर करने तथा उनका समाधान खोजने के प्रयास के लिए वर्ष 1997 का मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया |

महाश्वेता देवी का जीवन परिचय (Mahasweta Devi Biography In Hindi)

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को ढाका (अब बांग्ला देश) में हुआ था । पिता मनीष घटक तथा माँ धारिणी देवी दोनों के ही माध्यम से महाश्वेता देवी ने लेखन तथा समाज चिन्ता के संस्कार पाए थे ।

महाश्वेता देवी की स्कूली शिक्षा ढाका में शुरू हुई लेकिन देश के विभाजन के बाद वह सपरिवार पश्चिमी बंगाल आ गईं । वहाँ उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय के शान्ति निकेतन से अंग्रेजी में बी.ए. ऑनर्स की परीक्षा पास की । एम.ए. अंग्रेजी के लिए वह कलकत्ता, यूनिवर्सिटी में आईं और वहीं से परीक्षा उत्तीर्ण की । वर्ष 1964 में उन्होंने विजयगढ़ कॉलेज में अध्यापन शुरू किया । यह कॉलेज कलकत्ता यूनिवर्सिटी द्वारा कामकाजी महिलाओं के लिए चलाया जा रहा था । अध्यापन के साथ महाश्वेता देवी ने पत्रकारिता, रचनात्मक लेखन तथा आदिवासियों के जीवन का अध्ययन शुरू किया । वह दलित तथा स्त्रीविमर्श की दिशा में सक्रिय रहीं ।

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महाश्वेता देवी ने बिहार, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का जीवन उनके बीच रहकर तथा उनमें घुल-मिलकर समझा । उनका ध्यान विशेष रूप से लोढ़ा तथा शबरा आदिवासियों की ओर अधिक रहा । वहाँ उन्होंने देखा कि वह जमींदारों के तथा व्यवस्था के भी दमन के शिकार हैं । 1965 में बिहार के पलामू क्षेत्र को देखते हुए उसे ‘आदिवासी भारत का दर्पण कहा । यहाँ उन्होंने देसी समाज को ऋणी तथा बंध रूप में विवश देखा । इन्हें स्त्रियों की दशा विशेष रूप से दयनीय लगी । उन्होंने महसूस किया कि उनके जीवन का स्तर मनुष्यों जैसा उपलब्ध नहीं है । वहाँ न शिक्षा है, न स्वास्थ्य सेवा । न ही कोई सड़क रास्ता है, न आमदनी का कोई जरिया । उनके लिए यह हृदय विदारक था । महाश्वेता देवी ने इन अनुभवों को अपने लेखन के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया । 1973 में प्रकाशित उपन्यास ‘हजार चौरासिवें की माँ’ में उन्होंने दिखाया कि क्यों एक माँ का बेटा हिंसक विद्रोह पर उतर आता है और अंतत: उसकी हत्या हो जाती है ।

महाश्वेता देवी ने समसामयिक दृष्टांतों को देसी मौखिक ऐतिहासिक प्रसंगों के साथ बारीकी से बुना और यह व्यक्त किया कि कैसे आदिवासी भारत की प्रभुत्व सम्पन्न जातियों द्वारा तथा व्यवस्था द्वारा प्रताड़ित किए जा रहे हैं । उनकी कहानियों में सचमुच की, जीती जागती स्त्रियों की जिन्दगी सामने लाई गई जिसमें दमन एक दिन उन्हें प्रतिकार में खड़ा कर देता है । और वह किसी मिथकीय पात्र में बदल जाती हैं ।

रचनात्मक लेखन के साथ-साथ महाश्वेता देवी की गतिविधि सीधे-सीधे व्यवस्था से टकराव की भी रही, उन्होंने पुलिस, जमींदार, राजनेताओं तथा आदिवासियों की उन तमाम कार्यवाहियों के खिलाफ सरकार को शिकायती पत्र लिखे तथा उन्हें अखबारों में प्रकाशित कराया, जहाँ उन्हें आदिवासियों के साथ अन्याय या दुर्व्यवहार का कोई मामला नजर आया । इस तरह एक जुनून की तरह उन्होंने आदिवासियों के सरोकारों को अपना विषय बना लिया ।

1970 के प्रारम्भ से ही महाश्वेता देवी ने स्थितियों और व्यवस्था के बीच सीधा हस्तक्षेप शुरू कर दिया । उन्होंने आदिवासियों तथा अन्य प्रताड़ितों की पूरी सहायता की कि वह अपनी शिकायतों, अपने आपसी वैमनस्यों पर आवाज उठाएँ और अपने विकास के हक की माँग करें । खेड़िया शबर जन कल्याण सभा (खेड़िया शबर वेलफेयर सोसायिटी) के जरिये पश्चिमी बंगाल के बेहद गरीब आदिवासियों को पेड़ उगाना, सिंचाई करना, हस्तशिल्प का सामान बनाना, अपनी बचत को सम्भालना तथा स्वास्थ्य सफाई का ध्यान करना सिखाया गया । उन्हें लिखने-पढ़ने की राह सुझाई गई । महाश्वेता देवी ने वार्षिक मेलों का आयोजन शुरू कराया ताकि वह अपने काम को प्रदर्शित कर सकें और उसके जरिये उन सबमें आत्मविश्वास पैदा हो । ऐसी बहुत सी सोसायिटियाँ इन्होंने बनाई और उन्हें काम सिखाया ।

महाश्वेता देवी ने पश्चिमी बंगाल की औद्योगिक नीतियों के खिलाफ आन्दोलन छेड़ा ताकि विकास के नाम पर इन हाशिए पर पड़े लोगों का हित सरकार अनदेखा न कर सकें । सिंगुर तथा नन्दीग्राम में महाश्वेता देवी ने इसी का उदाहरण प्रस्तुत किया ।

महाश्वेता देवी ने विश्वभारती और शान्तिनिकेतन के व्यवसायीकरण का भी सक्रिय विरोध किया और इस बात पर बल दिया कि यह संस्थान गुरुदेव ने कमाई के लिए नहीं खोला था । उन्होंने यह याद किया कि उनकी शिक्षा वहीं से शुरू हुई थी ।

महाश्वेता देवी का एक प्रसंग उनकी भावप्रवणता को सामने लाता है । 2006 में वह फ्रेंकफर्ट पुस्तक मेले के उद्‌घाटन समारोह में बोल रही थीं । भारत वह पहला देश था जो उस समारोह का दूसरी बार अतिथि राष्ट्र बनाकर आमन्त्रित किया गया था । निश्चित रूप से उस समय भारतीयता की भावना सघन थी । उस समारोह में बोलते समय महाश्वेता देवी ने राजकपूर के एक मशहूर गीत का सन्दर्भ ऐसे उठाया कि सभी श्रोता द्रवित हो उठे ।

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उन्होंने कहा, कि यही ठीक समय है, जब हमारा जूता जापानी है, पतलून अंग्रेजी है, सिर पर रूसी टोप है, यानी हम वैश्विक हो रहे हैं, लेकिन हमारा दिल हमारी भावना हमारी मौलिक दृष्टि हिन्दुस्तानी ही है । मेरा भारत छिन्न-भिन्न है, फिर भी सुन्दर है तथा गर्व करने लायक है ।

महाश्वेता देवी की कलम से बाईस महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं । हजार चौरासिर माँ, अरण्येर अधिकार, रुदाली, ऐसी अनेक कृतियाँ हैं, जो साहित्य का उत्कर्ष है ।

महाश्वेता देवी ने बहुत से महत्त्वपूर्ण पुरस्कार पाए । 1979 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला तो 1996 में उन्हें देश का नोबेल कहा जाने वाला ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया । 1986 में उन्हें पद्‌मश्री सम्मान मिला और 2006 में वह पद्‌मविभूषण से अलंकृत हुईं ।

महाश्वेता देवी अभी भी सक्रिय हैं । वह प्रसिद्धि एवं इन्टरव्यू देने से बचती हैं । एक पत्रकार को उन्होंने उत्तर दिया था :

‘मैं इन्टरव्यू क्यों दूँ…मेरा काम अपने आप बोलेगा…’ |

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