ब्रज यात्रा – नंदगांव, बरसाना, गोवर्धन, और राधाकुंड का इतिहास और यात्रा

ब्रज यात्रा – नंदगांव, बरसाना, गोवर्धन, और राधाकुंड का इतिहास और यात्रा Nandgoan Barsana Goverdhan And Radhakund History In Hindi

नंदगांव, बरसाना, गोवर्धन, राधाकुंड और वृन्दावन सब पास-पास ही हैं। नंदगाव भगवान श्रीकृष्ण और माता यशोदा के यहां लालन- पालन होने के कारण प्रसिद्ध है। वैसे यह नन्दीश्वर महादेव की पहाड़ी है। कहते हैं कि तांडल ऋषि ने कंस को श्राप दिया था, कि यदि तुम्हारा कोई राक्षस या दूत नन्दीश्वर पहाड़ी पर गया तो पत्थर का बन जाएगा। इसलिए कंस के कहर से सुरक्षा पाने के लिए नन्दबाबा नन्दीश्वर पहाड़ी पर चले आए। इस तरह एक पूरा गांव आबाद हो गया। कई घर बन गए और उनके साथ ही नन्दबाबा का महल भी।

नंदगांव से लगा हुआ उद्धव वन है। उद्धव कृष्ण के परम मित्र થે | जहां कभी नंदबाबा का महल हुआ करता था, वहां आज श्रीकृष्ण-बलराम मंदिर है। मंदिर तक पहुंचने के लिए गलियों से गुजरते हुए अन्त में 60-70 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। इस मंदिर के अलावा यहां पर देखने योग्य छोटे-छोटे कई अन्य स्थल भी हैं, जिनका बड़ा धार्मिक महत्व है। इनमें सास कुंड, छाछ कुंड, टेर कदम, गोवर्धन नाथ मंदिर, राधा कृष्ण मंदिर, नन्द बाग, फुलवारी कुंड, गऊशाला, भोजन स्थल आदि हैं।

नंदगांव बरसाना की होली से मात्र 6 कि.मी. पर संकेत पड़ता है। मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, राम चबूतरा, झूला मंडप आदि देखने योग्य स्थल हैं। बरसाना में राधा जी ने जन्म लिया था। राधा महाराज वृषभानु की पुत्री थीं। राधा, श्रीकृष्ण से इतना प्यार करती थीं कि मात्र उनके शरीर अलग-अलग थे पर उनकी आत्मा एक हो चुकी थी। नंदगांव से बरसाना केवल 7-8 कि. मी. दूर है। कृष्ण, नंदगांव से कदम्ब के और राधा प्रेम की मारी दौड़ी चली आती थीं। राधा और श्रीकृष्ण के अमर प्रेमी होने का गौरव बरसाना की जाता है।

यहां पर विश्व भर में प्रसिद्ध होली खेली जाती है। नंदगांव के पुरुष फाल्गुन एकादशी को बरसाना में होली खेलने आते हैं। दूसरे दिन बरसाना वाले नंदगांव में जाते हैं। यहां की लठमार होली देखने के लिए देश-विदेश से लोगों का तांता लगा रहता है। स्त्रियां, पुरुषों को लाठियों से पीटती हैं और पुरुष ढाल से उनके प्रहार को बचाते हैं। बरसाना में चारों तरफ चार सरोवर हैं। बरसाना में ही गोवर्धन पर्वत श्रृंखला दो भागों में बंटती है। पहली विष्णु पर्वत और दूसरी ब्रह्म पर्वत के नाम से जानी जाती है। विष्णु पर्वत के ऊपर कीर्तिदाता ऊपर राधा-कृष्ण मंदिर, वृषभानु मंदिर, प्रिया जी का मंदिर, दान मंदिर, ललित तथा मयूर कुटीर आदि हैं। राधा-कृष्ण मंदिर कभी राधा जी का महल था। इस मंदिर में बहुत अच्छी फुलवारी तथा बाग हैं। मंदिर ऊंचाई पर है। कई सीढ़ियां पार करनी पड़ती हैं।

गोवर्धन पर्वत, बरसाना से 20 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। इसे पर्वतराज के नाम से भी जाना जाता है। प्रत्येक महीने की अमावस्या व पूर्णिमा की श्रद्धालु गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा व पूजा करते हैं। गगनभेदी जयकारों के साथ-साथ 7 कोस की परिक्रमा का मनभावन दृश्य उपस्थित होता है। गोवर्धन की कथा विचित्र है। कहते हैं कि पहले ब्रज के लोग अच्छे धन-धान्य के लिए भगवान इन्द्र की पूजा करते थे। ग्वाल श्रीकृष्ण ने इन्द्र की पूजा छुड़वाकर एक बार गोवर्धन पर्वत की पूजा करवा दी। इससे इन्द्र कुपित हो उठे और उन्होंने पूरे ब्रज मंडल में इतनी तेज वर्षा करवा दी कि सभी ग्वाल-बाल और मवेशी हवा के थपेड़ों और पानी से इधर-उधर बहने लगे। लोग व्याकुल हो उठे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने पूरे गोवर्धन पर्वत की अपनी कनिष्का उंगली पर उठा लिया और उसके नीचे ब्रजवासी तथा जानवरों ने अपनी प्राण रक्षा की। क्रोधित इन्द्र की वर्षा सात दिनों तक चलती रही और भगवान श्रीकृष्ण ने उतने ही दिन तक गोवर्धन की उंगली पर उठाए रखा। अन्त में इन्द्र का घमंड समाप्त हो गया। उसने अपने किए पर श्रीकृष्ण से क्षमायाचना की। तब से यह पर्वत पूजा जाता है। यहां दर्शनीय स्थलों में मुखारविन्द,मानसी गंगा कुंड, दान घाटी, चक्रतीर्थ, पूछरी, जतीपुरा, श्री हरदेव मंदिर, चन्द्र सरोवर, मनसा देवी मंदिर आदि हैं।

गोवर्धन से राधाकुंड की दूरी मात्र 6 कि.मी. है। यहां पर कृष्ण कुंड और राधा कुंड नाम के दो तीर्थ हैं। इन दोनों तीर्थों के चारों ओर राधा की आठ सखियों के आठ कुंड हैं। राधा कुंड माधव गोडेश्वर सम्प्रदाय का मुख्य तीर्थ है। कहते हैं कि कंस ने एक बार श्रीकृष्ण की मारने के लिए वृषासुर नामक राक्षस को भेजा था। वह अपने खुरों से पृथ्वी को खोदने लगा और अपने सींगों से पहाड़ों को पलटने लगा। उसके इस भयानक मायावी कामों को देखकर ग्वाल बाल घबरा उठे। श्रीकृष्ण ग्वालों को धैर्य बंधाकर वृषासुर से लड़ने चले गए। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अन्त में वृषासुर श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया।

वृषासुर को मार डालने के बाद राधा ने श्रीकृष्ण से कहा कि तुमने बैल रूपी राक्षस को मारा है, इसलिए तुम्हें गोहत्या का पाप लग चुका है, तुम किसी को मत छूना। इस पाप के निवारण के लिए तुम्हें बारी-बारी सभी तीर्थों पर स्नान करना पड़ेगा। राधा के वचन सुन कृष्ण ने वहीं पर दो कुंड खुदवा दिए और सारे तीर्थों और नदियों की उसमें जल डालने को कहा। भगवान श्रीकृष्ण का आदेश पाकर सभी तीर्थ व नदियां वहां आकर कुंड में जल डाल गयीं। तब एक कुंड में राधा ने तथा दूसरे कुंड में श्रीकृष्ण ने स्नान किया। जिसमें राधा ने स्नान किया वह राधा कुंड कहलाया तथा जिसमें श्रीकृष्ण ने स्नान किया वह कृष्ण कुंड कहलाया। इन कुंडों में स्नान से श्रद्धालुओं को सभी तीर्थों के फल सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।