स्वर्णमन्दिर की यात्रा और इतिहास Swarn Mandir Amritsar Punjab History In Hindi

स्वर्णमन्दिर की यात्रा और इतिहास Swarn Mandir Amritsar Punjab History In Hindi

स्वर्णमन्दिर सिख धर्म का सबसे प्रमुख व पवित्र तीर्थ-स्थल है। पंजाब के अमृतसर शहर में स्थित इस गुरुद्वारे की स्थापना गुरु अमरदास जी ने की थी। श्री हरमंदिर साहिब के सरोवर का निर्माण गुरु रामदास ने आरम्भ किया था। इस सरोवर का नाम ‘अमृतसर’ रखा गया और इसी के नाम से इस शहर का नाम अमृतसर पड़ा।

सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी ने इस सरोवर के बीच में हरमंदिर का निर्माण करवाया। गुरु अमरदास जी ने 1564 ई. में अपने हाथों से इसकी नींव का पहला पत्थर रखा। यहीं पर ‘गुरु का महल’ बनाया गया। यह गुरु रामदास जी, गुरु अर्जुन देव जी और गुरु हरगोविंद जी महाराज का निवास स्थान था और श्री गुरु तेगबहादुर का जन्म भी यहीं हुआ।

बाबा बुडूढा जी द्वारा विधिवत अरदास करने के बाद गुरु रामदास जी ने पहला फावड़ा चलाया और इस तरह अमृतसर मन्दिर के पवित्र सरोवर की खुदाई आरंभ हुई। लाखों भक्तजनों ने पूरी श्रद्धा से इसकी कारसेवा में भाग लिया। यह सरोवर पांच सौ फुट लंबा, 490 फुट चौड़ा और 18 फुट गहरा है। समय-समय पर भक्तजन कारसेवा करके इसकी सफाई करते हैं।

हरमंदिर साहिब के चारों ओर चार द्वार हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि इस मंदिर के द्वार सभी लोगों के लिए बिना किसी भेदभाव के खुले हैं। सन् 1862 में अहमदशाह दुर्रानी ने हरमंदिर साहिब को काफी नुकसान पहुंचाया, लेकिन थोड़े ही समय बाद सिखों ने एकजुट होकर फिर अमृतसर पर कब्जा कर लिया और अक्तूबर 1864 को जस्सा सिंह आहलुवालिया ने नए हरमंदिर साहिब की नींव रखकर इसकी इमारत का निर्माण कार्य पुनः आरंभ करवा दिया।

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महाराजा रणजीत सिंह ने हरमंदिर साहिब पर सोना चढ़ाने के लिए पांच लाख रुपये दिए और इसके बाद इसे ‘स्वर्णमंदिर’ के नाम से पुकारा जाने लगा। स्वर्ण मंदिर की बारीक नक्काशी, जिसे मोहम्मद यार खां मिस्त्री ने बनाया था, आज भी सारी दुनिया में बेजोड़ मानी जाती है।

रात में स्वर्ण मंदिर की रंगबिरंगी रोशनियों का प्रतिबिंब सरोवर के जल में देखते ही बनता है। गुरु अर्जुन देव ने सबसे पहले हरमंदिर साहिब में ग्रंथी परंपरा का आरंभ किया था। उन्होंने 1661 में बाबा बुड्ढा जी को हरमन्दिर साहिब का पहला ग्रंथी नियुक्त किया था। बाबा बुड्ढा जी को । समाज में बहुत सम्मान अर्जित था। था।

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अकाल तख्त सिख पंथ का सर्वोच्च तख्त है। यह हरमंदिर साहिब की दर्शनी ड्यौढ़ी के पश्चिम में स्थित है। सिखों के छठे गुरु गोविंद सिंह ने संवत् 1665 में इसकी नींव रखी थी। इसकी नींव का निर्माण कार्य बाबा बुड्ढा जी ने करवाया था। रोज शाम को गुरु हरगोविंद जी अकाल तख्त पर बैठ कर उनकी अड़सठ घाट, गुरुद्वारा इलायची बेर, परिक्रमा सरोवर, गुरु का बाग, गुरुद्वारा जी साहिब, गुरुद्वारा बाबा अटल राय साहिब, गुरुद्वारा गुरु महल, गुरुद्वारा चुरमती अटारी, गुरुद्वारा किला लोहगढ़ साहिब, गुरुद्वारा पिपली साहिब, गुरुद्वारा टहली शिकायतों और झगड़ों का निपटारा किया करते थे।

अमृतसर के जलियांवाला बाग में उन शहीदों का स्मारक भी है जिन्हें 13 अप्रैल 1919 को हुए नरसंहार में अंग्रेजों द्वारा गोलियों से भून दिया गया था।पर्यटक बड़ी संख्या में यहां जाते हैं।