टी.एन. शेषन का जीवन परिचय TN Seshan Biography In Hindi

टी.एन. शेषन का जीवन परिचय (TN Seshan Biography In Hindi Language)

TN Seshan Biography In Hindi

नाम : टी.एन. शेषन
जन्म : 15 मई 1933
जन्मस्थान : तिरुनेल्लई, जिला पालघाट, (केरल)
उपलब्धियां : मैग्सेसे पुरस्कार (1996) |

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के रास्ते सरकारी सेवा में आए टी.एन. शेषन ने दिसम्बर 1990 को देश के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सम्भाला था और वह इस पद पर 1996 तक बने रहे थे । इस दौरान शेषन ने चुनाव प्रक्रिया में बहुत सुधार किए और ऐसे नियम लागू किए जिनसे स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न हो सकें | इस काम में उन्हें उस समय के राजनैतिक नेताओं और नौकरशाही द्वारा बहुत विरोध झेलना पड़ा लेकिन वह डिगे नहीं और निर्भीकतापूर्वक अपने निर्णयों को लागू कराने की कोशिश करते रहे | उनके इस जुझारू प्रयास से लोकतन्त्र मजबूत हुआ और मतदाता का चुनाव के प्रति विश्वास बढ़ा । शेषन की इस लगन और जिम्मेदारी भरी राजकीय सेवा के लिए उन्हें 1996 का मैग्सेसे पुरस्कार प्रदान किया गया ।

टी.एन. शेषन का जीवन परिचय (TN Seshan Biography In Hindi)

टी.एन. शेषन का जन्म 15 मई 1933 को केरल के पालघाट जिले में, तिरुनेल्लई गाँव में हुआ था । शेषन के पिता एक वकील थे । अपने छह भाई-बहनों में टी.एन. शेषन सबसे छोटे थे । उनका परिवार निम्न मध्यवर्ग जैसा था जिसमें सबका निर्वाह हो रहा था ।

शेषन की पढ़ाई पालघाट के बेसेल इवांजिकल मिशन स्कूल में शुरू हुई । यह स्कूल एक स्विस मिशनरी द्वारा चलाया जा रहा था । 40 के दशक में यहाँ से शेषन ने हाई स्कूल की परीक्षा पास की । अपनी पढ़ाई के दौरान शेषन एक ‘किताबी कीड़ा’ किस्म के छात्र रहे । वह शतरंज खेलते थे लेकिन दौड़ भाग के खेलों में उनकी रुचि नहीं थी । इसी स्कूल से उन्होंने इण्टरमीडियट परीक्षा भी पास की । उनकी रुचि विज्ञान तथा इंजीनियरिंग विषयों में थी । इसीलिए उन्होंने साइंस ली थी और फिजिक्स (भौतिक शास्त्र) पढ़ा था । इण्टर के बाद बी.एस.सी ऑनर्स उन्होंने चेन्नई के क्रिश्चियन कॉलेज से किया । वह वहाँ ‘सेलायुर हॉल’ नाम के हॉस्टल में रहते थे । यहीं से इन्होंने चार साल का पाठ्‌यक्रम तीन साल में पूरा करके मास्टर्स की डिग्री ली । इस बीच वह दिन-रात बस हॉस्टल में ही रहे ।

1950 के दशक में शेषन ने कुछ समय बतौर वैज्ञानिक काम किया । करीब तीन साल अपने कॉलेज में पढ़ाया भी लेकिन फिर कम वेतन की वजह से वह काम छोड़ दिया । 1954 में टी.एन. शेषन ने भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) की प्रतियोगी परीक्षा दी और सफल हुए, इस तरह 1955 से उनकी राजकीय सेवा की शुरुआत हुई ।

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मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के पहले, शुरुआत से ही शेषन की छवि एक ईमानदार, तेज-तर्रार अधिकारी की रही । शुरुआती पोस्टिंग में ही, जब वह डिंडी गुल मदुराई में सब कलेक्टर थे तब उनकी कट्टरता का प्रमाण सामने आया । एक हरिजन व्यक्ति के ऊपर गबन का आरोप लगा हुआ था । उस व्यक्ति का विवाह स्थानीय कांग्रेस पार्टी की प्रेसिडेंट से हुआ था । इस नाते शेषन पर एक मंत्री का दबाव बन रहा था कि उस गिरफ्तार किए गए आरोपी को छोड़ दिया जाए । यहाँ शेषन ने गहरी सूझबूझ से काम लिया । चतुराईपूर्वक अपनी नौकरी भी बचाई और अपने निर्णय से कोई समझौता भी नहीं किया ।

इसी तरह 1958 में वह ग्राम विकास के सेक्रेटरी के रूप में चेन्नई आए थे और पंचायत का काम सम्भाल रहे थे । इस व्यवस्था पर स्थानीय राजनैतिक नेताओं का अनुचित हस्तक्षेप बहुत रहता था । शेषन ने वहीं सबका विरोध सहते हुए ऐसे नए कानून बनाए, जिससे प्रशासन का सशक्तीकरण हुआ ।

अपने कार्यकाल में शेषन कुचक्रों का शिकार कई बार हुए और हर बार उन्होंने उसे सफलतापूर्वक पार किया । 1962 में वह सचिवालय में थे । वहाँ किन्हीं तर्क संगत मुद्दों पर अपनी राय पर दृढ रहने के कारण उनका सचिवालय से तबादला करके लघु बचत योजना, महिला तथा पिछड़ी जाति के कल्याण विभाग में भेज दिया गया । यहाँ शेषन ने जिस गहरी रुचि से काम किया उससे उनकी ख्याति सभी सम्बन्धित विभागों में पहुँची और उनकी पहचान और गहरी हुई । यहाँ से शेषन को डायरेक्टर बना कर परिवहन विभाग में चेन्नई भेज दिया गया । परिवहन तथा उद्योग मन्त्री राधास्वामी वेंकटरमन ने शेषन को बताया कि चेन्नई की परिवहन व्यवस्था खराब स्थिति में है । उन्होंने सलाह दी कि शेषन उस चुनौती को स्वीकार करें और व्यवस्था में सुधार लाएं । वेंकट रमन तक शेषन की तारीफ पहले से ही पहुँची हुई थी । शेषन ने चुनौती स्वीकार करते हुए चार हजार कर्मचारियों और चालीस हजार बसों के बेड़े की जिम्मेदारी उठा ली ।

शेषन ने इस बीच सभी समस्याओं को समझा और अनुशासन की स्थिति को सुधारना शुरू किया । वह इस काम में इस तरह जुट गए कि एक बार ड्राइवरों की हड़ताल के दौरान वह स्वयं बस लेकर निकल पड़े । उन्होंने यह दिखाया कि वह सिर्फ अफसरशाही ही नहीं कर सकते हैं, बल्कि हुनरमंद भी हैं । यहाँ उन्होंने ढाई बरस काम किया और व्यवस्था को पटरी पर ला दिया । शेषन स्वयं इस बात को कहते हैं कि इस काम में उन्होंने बहुत सीखा है, जिसका फायदा उन्हें भविष्य में भी मिला ।

इस जिम्मेदारी को पूरा करने के बाद शेषन मदुराई के कलेक्टर नियुक्त किए गए । दिसम्बर 1964 से उन्होंने यह पद सम्भाला था । उसी दौरान उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में एड मैसन फैलोशिप मिल गई और वह अपनी पत्नी जयलक्ष्मी के साथ उत्तरी अमेरिका चले गए । वहाँ उन्होंने खूब घुमक्कड़ी भी की और 1968 में ‘पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन’ में मास्टर्स की डिग्री भी ली । वह समय उनके लिए बहुत मौज का रहा, बस एक मुश्किल यह थी कि वह शाकाहारी थे और अमेरिका का खानपान इस दृष्टि से अनुकूल नहीं था ।

1969 में विदेश से लौटकर शेषन को भारत सरकार की उच्चत्तर सेवाओं अनुभव मिलना शुरू हुआ आते ही वह एटामिक एनर्जी विभाग के सचिव बनाए गए । यह विभाग सीधे प्रधानमन्त्री के अधीन था । वह इस पद पर 1976 तक रहे और वह स्वयं मानते हैं कि यहीं पर उन्होंने सीखा कि टकराव के माध्यम से भी बेहतर परिणाम पाए जा सकते हैं ।

उसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त बनने तक का समय शेषन के लिए बहुत अनुभव तथा संघर्ष देने वाला रहा । नागरिक प्रशासन में राजनैतिक नेताओं का जबरदस्त हस्तक्षेप सबसे बड़ी कठिनाई थी । शेषन ने इस सम्बन्ध में बार-बार यह कहा कि ”राजनैतिक नेता राज्यों को लूट रहे हैं” जहाँ-जहाँ स्पष्ट नियम नहीं थे वहाँ शेषन ने नियम बनवा कर इस हस्तक्षेप पर लगाम लगाई । 1980 से 1985 के बीच वह अन्तरिक्ष मंत्रालय में एडिशनल सेक्रेटरी रहे और विज्ञान तथा इजीनियरिंग की रुचि तथा ज्ञान के बल पर अनुसंधान में भी भागीदारी की । उसी दौरान शेषन राजीव गाँधी (प्रधानमन्त्री) के आमन्त्रण पर वन तथा पर्यावरण मंत्रालय में लाए गए । यहीं उन्हें कैबिनेट सेक्रेटरी का ओहदा सौंपा गया । राजीव गाँधी के प्रधानमन्त्री पद से हट जाने के बाद शेषन कुछ कठिनाई में पड़े लेकिन उस समय के कानून मंत्री ने इनके सम्मुख मुख्य चुनाव आयुक्त बनने का प्रस्ताव रखा, जो शेषन ने राष्ट्रपति, तथा राजीव गाँधी से परामर्श के बाद स्वीकार कर लिया । उनका यह कार्यकाल 12 दिसम्बर 1990 को शुरू हुआ ।

पदभार संभालते ही शेषन की सक्रियता शुरू हो गई । पहले तो उन्होंने चुनाव आयोग के दफ्तर में लगे विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र उतरवाए ताकि वहाँ की छवि धर्मनिरपेक्ष नजर आए । उस दौरान चुनाव आयोग विभाग में आयोग के अपने कर्मचारियों के अतिरिक्त अलग-अलग राज्य सरकारों के कर्मचारी भी अस्थायी तौर पर नियुक्त थे और काम कर रहे थे । इन अस्थायी कर्मचारियों की निष्ठा चुनाव आयोग के प्रति न होकर अपनी राज्य सरकारों के प्रति अधिक थी और यह कर्मचारी यह मानकर चलते थे कि चुनाव आयोग का उन पर कोई जोर नहीं चल सकता है । शेषन के लिए यह स्थिति अनुकूल नहीं थी क्योंकि ये कर्मचारी पूरी तरह से आयोग के प्रति निष्ठावान नहीं थे । शेषन ने इस भ्रम को तोड़ने का कदम उठाया । इससे असन्तोष की स्थिति फैली । राज्य सरकार के अधिकारी भी उससे शेषन के विरोध में खड़े हो गए । लेकिन शेषन डिगे नहीं । उन्होंने धैर्यपूर्वक अपना आग्रह बनाए रखा और राज्य सरकार के अधिकारियों से भी बात की । कठिनाई यह थी कि राज्य सरकार के अधिकारीगण ज्यादातर, स्थानीय नेताओं की कठपुतली भर थे । फिर भी शेषन ने हार नहीं मानी और अन्तत: सभी कर्मचारियों को अनुशासन में आना पड़ा ।

शेषन के सामने तीन मुख्य काम थे । मतदाता का सशक्तीकरण, चुनाव प्रक्रिया में सुधार और सबसे ऊपर था, चुनाव आयोग की स्वायत्तता । शेषन ने तीनों ही क्षेत्रों में अपना काम शुरू किया । चुनाव में मतदाता पहचान पत्र का प्रयोग तथा चुनाव कार्यों में प्रत्याशियों और उनके दलों द्वारा किए जा रहे खर्च पर अंकुश शेषन को सबसे जरूरी लगा । यही काम सबसे कठिन भी था । इसी के जरिये चुनावों में धाँधली का रास्ता खुलता था । शेषन की बन्दिशें उनके खिलाफ जाने वाली थीं, जो भ्रष्टाचार और खरीदे गए वोटों के सहारे चुनाव में उतरते थे । मतदाता केन्द्रों पर जबरन कब्जा तथा हिंसा भी शेषन की नजर में थी जिस पर उन्हें अंकुश लगाना था । शेषन इस सब में निडर होकर उतर गए ।

1993 में तमिलनाडु में चुनावों के दौरान हिंसा की सम्भावना थी । स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए इस हिंसा को रोकना जरूरी था । इसलिए, उन्होंने राज्य सरकार से सैन्यबल की माँग की और चाहा कि राज्य सरकारें इस दिशा में सहयोग करें । लेकिन तत्कालीन गृह राज्य मन्त्री ने शेषन की माँग ठुकरा दी । इस पर शेषन ने घोषणा कर दी कि इसे माने गए बगैर वह चुनाव नहीं कराएँगे । टकराहट की स्थिति पैदा हो गई । शेषन अडिग रहे । उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखी । इससे पहले कि सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला दे, शेषन ने उसके बाद चुनावों की घोषणा कर दी । इसका जनता पर तथा व्यवस्था पर भी अच्छा प्रभाव पड़ा और शेषन के लिए जनमत बना ।

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उसी दौरान अक्टूबर 1993 में सरकार ने संविधान में परिवर्तन करके दो और मुख्य चुनाव आयुक्त, एम.एस.गिल तथा कृष्णमूर्ति लाकर बैठा दिए । ये दोनों सरकार के अपने आदमी थे । यह बात शेषन को बेहद नागवार गुजरी । उन्होंने फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया । सुप्रीम कोर्ट ने अन्तरिम राहत देते हुए कहा कि शेषन बाकी दोनों मुख्य चुनाव आयुक्तों का निर्णय मानने के लिए बाध्य नहीं हैं । वैसे भी तीन आयुक्तों का होना न कभी पहले देखा गया था, न ही उसके बाद कभी हुआ । शेषन इस दबाव के बावजूद काम में जुटे रहे । लेकिन अन्त में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, काफी लम्बा खिंचने के बाद यही आया कि तीनों आयुक्त बराबर का ओहदा रखेंगे । यह फैसला 2 फरवरी 1996 को आया तथा 11 दिसम्बर 96 को शेषन चुनाव आयोग का कार्यकाल पूरा करके पदमुक्त हो गए । इस बीच वह अन्त तक अपने प्रयास में लगे रहे । न हारे, न झुके ।

इस तमाम विरोध और टकराव के बावजूद शेषन की छवि एक ईमानदार तथा निष्ठावान व्यक्ति की बनी रही । वह बेहद खरी बात कहने के लिए मशहूर थे और अक्सर कड़वा बोल जाते थे । जैसे अपने काम के दौरान उन IAS अधिकारियों को वह ‘पॉलिरड कॉल गर्ल्स’ कहते थे, जो बड़े नौकरशाहों और राजनैतिक नेताओं के आगे झुक जाते थे । उन्हें यह भी कहते सुना गया कि वह शाकाहारी हैं जरूर लेकिन भ्रष्ट बेईमानों को कच्चा खा जाने वाले हैं । फिर भी, न कभी उन्होंने अपना शाकाहार बदला न ही कभी व्यवहार में संयम खोया ।

उन्होंने राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन दिया । पत्रकार द्वारा पूछे जाने पर उनका जवाब था कि मैं जानता हूँ कि मैं जीतूँगा नहीं । लेकिन प्रतियोगिता में भाग लेना मुझे अच्छा लगता है । स्कूल में भी, खेल-कूद में बिल्कुल न होने के बावजूद मैंने लांग जंप की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था ।

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