विश्वनाथन आनंद का जीवन परिचय Viswanathan Anand Biography In Hindi

विश्वनाथन आनंद का जीवन परिचय (Viswanathan Anand Biography In Hindi Language)

Viswanathan Anand Biography In Hindi

नाम : विश्वनाथन आनंद
जन्म : 11 दिसम्बर, 1969
जन्मस्थान : चेन्नई (तमिलनाडु)

विश्वनाथन आनंद को भारत के अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जैसे ‘अर्जुन पुरस्कार’, ‘पद्मश्री’,(इस पुरस्कार को पाने वालों में तब तक सबसे कम आयु के विजेता), प्रथम ‘राजीव गांधी खेल रत्न’ पुरस्कार, ‘सोवियत लैण्ड नेहरु अवार्ड’, ‘स्पोर्ट्स स्टार’, स्पोर्ट्समैन आफ द ईयर’ आदि |

विश्वनाथन आनंद का जीवन परिचय (Viswanathan Anand Biography In Hindi)

विश्वनाथन आनंद को यदि भारतीय शतरंज का बादशाह कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी । वह वर्ष 2000 में भारत के ही नहीं एशिया के प्रथम शतरंज विश्व-चैंपियन बने । यदि विश्व के प्रथम विजेता विल्हम स्टीन्ज से गणना करें जो 1886 में विजेता बने थे तो आनन्द 15वें विश्व-चैंपियन बने ।

24 दिसम्बर, 2000 को उन्होंने तेहरान में हुई चैंपियनशिप में, रूस में जन्मे अपने स्पेनिश प्रतिद्वन्दी अलेक्सई शिरोव को छह खेलों के चौथे मुकाबले में हरा कर विश्व-चैंपियन का खिताब हासिल किया । ऐसी शानदार विजय सम्भवत: विश्व चैंपियनशिप के खेलों में दोबारा होनी मुश्किल है | इस मुकाबले में विजय प्राप्त करने पर आनंद को 6,60,000 डॉलर की राशि पुरस्कार स्वरूप प्राप्त हुई ।

वर्ष 2002 में विश्वनाथन आनंद ने विश्व स्तर की चौथी सफलता प्राप्त कर एक बार फिर नया इतिहास रच डाला । फ्रांस में होने वाले कोर्सिका ओपन चेस टूर्नामेंट के पहले खेल में हारने के बाद आनंद ने अन्तिम छठे खेल में रूस के अनोतोली कारपोस को हरा कर विजय प्राप्त की । वर्ष 2002 में ही आनंद ने मई में प्राग में यूरोटेल टाइटल जीता, जुलाई में ‘चेस क्लासिक’ का मैन्ज टाइटल जीता । फिर अक्टूबर में हैदराबाद में होने वाले विश्व कप शतरंज में पुन: अपनी प्रभुता साबित की और फिर विश्व कप विजेता साबित हुए । उन्हें पुरस्कार स्वरूप 46,000 डालर की राशि प्राप्त हुई ।

वर्ष 2000 में आनंद ने विश्व चैंपियन बनने का सपना तो पूरा कर लिया था परन्तु फिडे रेटिंग में पहले नम्बर तक पहुँचने में 23 वर्ष लग गए । 1984 में अपना कैरियर शुरू करने वाले आनंद की रिकॉर्ड-बुक 2007 में पूरी हो सकी । मार्च 2007 में विश्वनाथन आनंद ने लिनारेस मोरेलिया शतरंज खिताब जीतकर फिडे रेटिंग में पहला स्थान प्राप्त कर यह गद्दी हासिल कर ली । मोरेलिया लिनारेस का खिताब जीतने पर आनंद के फिडे ईएलओ अंकों की संख्या बढ्‌कर 2816 पर पहुँच गई और आनंद दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी बन गए ।

विश्वनाथन आनंद के पास पुरस्कारों और ट्राफियों का इतना ढेर है कि विश्व का कोई भी सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी उनसे ईर्ष्या कर सकता है ।

आनंद अपने तीन बहन-भाइयों के बीच सबसे छोटे हैं । उनका बड़ा भाई व बहन शतरंज नहीं खेलते । विश्वनाथन आनंद को प्यार से विशी नाम से जाना जाता है, उन्हें टाइगर ऑफ मद्रास भी कहा जाता है ।

जब आनंद के पिता फिलीपीन्स में रेलवे की प्रतिनियुक्ति पर थे तब वहां शतरंज बहुत लोकप्रिय खेल था । उन्होंने मात्र 6 वर्ष की आयु में अपनी मां सुशीला से शतरंज सीखा । आनंद के पिता दक्षिण रेलवे में कार्यरत थे ।

आनंद के बारे में उनकी मां सुशीला का कहना है- ‘जब मैंने आनन्द को शतरंज सिखाया तब वह मात्र 6 वर्ष का था, और मुझे इस बात का बिकुल अंदाजा नहीं था कि एक दिन वह शतरंज का विश्व-चैंपियन बन जाएगा । वैसे वह अन्य बच्चों से भिन्न नहीं था और बिल्कुल सामान्य बच्चा था । उसे शतरंज में दिलचस्पी थी, इस कारण मैंने उसे खेलना सिखाया ।’

हालांकि आज आनंद विश्व चैंपियन बन कर सारे संसार में भारत का नाम रोशन कर रहा है, परन्तु आज भी उसकी मां खेल में बहुत रुचि लेते हुए आनन्द को कुछ चालें चलने का सुझाव देती रहती हैं ।

इसे एक विडम्बना ही कहा जाएगा कि शतरंज जैसे बौद्धिक और असीम सम्भावनाओं वाले खेल की जन्म स्थली भारत है और यहीं से चलकर यह फारस, फिर अरब देशों में होते हुए यूरोप पहुंचा, उसके बाद यह सारे विश्व में पहुंच गया । बुद्धि-कौशल वाले इस खेल को पश्चिमी देशों के सिद्धान्त के अनुसार ढाला गया । पश्चिमी शैली के आधुनिक शतरंज का विकास भारत में स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद ही हुआ ।

आनंद ने शतरंज के खेल में बचपन में ही महारत हासिल कर ली और 13 वर्ष की अल्पायु में ही उनकी सफलता का सिलसिला चालू हो गया । 13 वर्ष की आयु में उन्होंने 1982 में तमिलनाडु जूनियर शतरंज का खिताब जीता ।  15 वर्ष की आयु में राष्ट्रीय जूनियर का खिताब जीता और उसी वर्ष फ्रांस में विश्व सब जूनियर शतरंज प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता ।

1985 में दूसरी बार एशियाई जूनियर शतरंज प्रतियोगिता जीतने के साथ ही उन्हें ‘इन्टरनेशल मास्टर’ का गौरवपूर्ण खिताब भी प्राप्त हुआ । 1986,1987,1988 में आनंद लगातार राष्ट्रीय चैंपियन बने । इन सफलताओं के पश्चात् भारत सरकार ने उन्हें ‘अर्जुन पुरस्कार’ से सम्मानित किया ।

1987 में आनंद ने फिलीपीन्स में विश्व जूनियर शतरंज चैंपियनशिप जीती और नया इतिहास रच डाला । वह भारत के ही नहीं एशिया के प्रथम विजेता बने । इन्हीं सफलताओं के साथ उन्हें 1988 में ग्रैंडमास्टर की उपाधि प्रदान की गई और इसे पाने वाले भी वह प्रथम भारतीय बने ।

1990 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आनंद को पहली बड़ी सफलता इटली की श्रेणी 18 प्रतियोगिता में मिली । इस प्रतियोगिता में आनंद ने विश्व के दिग्गज खिलाड़ी अनातोली कारपोव और गैरी कास्परोव को नाकों चने चबवा दिए । विश्व के 159 देशों में खेले जाने वाले इस खेल में अभी तक रूसी खिलाड़ियों का ही बोलबाला रहा है । 114 वर्ष के विश्व शतरंज के इतिहास में कुछ वर्ष के लिए अमरीका के बाबी फिशर ने अपनी धाक जमाई थी और उसके पश्चात् रूस से बाहर के विश्वनाथन आनन्द ने अपनी धाक जमाई है ।

1993 में आनंद की इलो रेटिंग 2700 अंक पार कर गई, यह एक करिश्माई गौरवपूर्ण उपलब्धि थी । यह रेटिंग 1997 में बढ्‌कर 2765 हो गई और विश्वनाथन आनंद दूसरे नम्बर के खिलाड़ी बन गए ।

1997 का वर्ष आनंद के लिए स्वर्णिम सफलताओं का वर्ष साबित हुआ । इस वर्ष में उन्होंने अनेक प्रतियोगिताएं जीतीं और एक प्रदर्शनी मुकाबले में कम्प्यूटरों को 4-2 से पराजित किया । हालैंड में अन्तर्राष्ट्रीय शतरंज संघ द्वारा आयोजित विश्व नाक आउट प्रतियोगिता में उन्होंने भाग लिया और अविजित रहे । लेकिन फिडे के निर्णय के कारण 3-3 से बराबर रहने पर टाई ब्रेकर में वह कारपोव से हारे हुए घोषित किए गए । 1997 व 1998 में उन्होंने शतरंज के आस्कर के लिए कास्परोव को पीछे छोड़ दिया । वह इस पुरस्कार को जीतने वाले रूस के बाहर के दूसरे खिलाड़ी हैं । इससे पूर्व बाबी फिशर ने 1970,1971, 1972 में यह कामयाबी हासिल की थी । 1994 और 1997 में उन्होंने मैलोडी एम्बर प्रतियोगिताएं जीती ।

इन सभी सफलताओं के अतिरिक्त उन्होंने वर्ष 2000 के अन्त में विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया । फिडे नियमों के अनुसार जिस खिलाड़ी की 2600 रेटिंग हो वह सुपर ग्रैंडमास्टर बन सकता है, जिस खिलाड़ी के 2500 अंक हों वह ग्रैंडमास्टर, जिसके 2400 अंक हों वह इन्टरनेशनल मास्टर बन सकता है । इस नियम के अनुसार 2800 रेटिंग वाला खिलाड़ी सुपर ग्रैंडमास्टर कहलाएगा । इसके पहले दो खिलाड़ी गैरी कास्परोव (2838) व ब्लादिमीर क्राम्निक (2803) इस रेटिंग तक पहुंच सके हैं |

अपनी तमाम सफलताओं के कारण ही आनंद हमारे आने वाले भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुके हैं । आनंद अभी युवा हैं और आने वाले लम्बे समय तक अपनी सफलताओं को जारी रख सकते हैं । आनंद के खेल में असीम सम्भावनाएं छिपी हैं । आनंद की उन्नति भारतीय उपमहाद्वीप में शतरंज के उत्थान व नए खिलाड़ियों के लिए भी आदर्श साबित होंगी ।

आनंद वाणिज्य विषय में स्नातक हैं । उन्हें खाली समय में संगीत सुनना व तैराकी पसन्द है । वह भविष्य में इस खेल के माध्यम से भारत के लिए पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक भी जीतना चाहते हैं । उनकी पत्नी अरुणा उनकी हर सुख-सुविधा का ध्यान रखती है । उनकी यात्रा के पूर्व उनकी सभी तैयारी करती है । आनंद की पत्नी अरुणा प्रतियोगिताओं व विदेश यात्राओं के दौरान सदैव उनके साथ रहती हैं । उन्होंने एक बार आनंद के बारे में कहा था-”मुझे कभी नहीं लगा कि मैं किसी चैंपियन से शादी कर रही हूँ । उनका सरल स्वभाव ही उनकी पहचान है ।” आनंद मानते हैं कि वह अपनी मां की प्रेरणा से ही शतरंज के शिखर तक पहुँच सके हैं । वास्तव में आनंद के बारे में कहा जाता है कि वह बहुत भले इंसान हैं । उनमें किलर इस्टिंक्ट की भी कमी है, परन्तु उन्हें हारना कभी पसंद नहीं रहा । शायद यही कारण है कि वह शतरंज के नंबर एक खिलाड़ी बन सके ।

विश्वनाथन आनंद ने विश्व चैंपियनशिप जीत कर सारी दुनिया को भारतीय बौद्धिक क्षमता का लोहा मनवा दिया है । उनके सुखद भविष्य और नई सफलताओं की हम कामना करते हैं और उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें बधाई देते हैं ।

2004 में विश्व के नम्बर दो खिलाड़ी विश्वनाथन आनंद ने अपना तीसरा शतरंज आस्कर जीत लिया । यह शतरंज का सर्वाधिक प्रतिष्ठित वार्षिक पुरस्कार है । आनंद को यह पुरस्कार 50 से अधिक देशों के शतरंज लेखकों, आलोचकों और पत्रकारों के बीच रायशुमारी के बाद घोषित किया गया । आनंद को सर्वाधिक 4150 अंक मिले और वह अपने निकटतम प्रतिद्वन्द्वी पीटर स्विडलर से काफी आगे रहे जिन्हें 2575 अंक मिले । विश्व के नंबर एक खिलाड़ी गैरी कास्परोव 2262 अंक पाकर चौथे स्थान पर रह गए ।

उपलब्धियां :

1983-84 में राष्ट्रीय सब जूनियर चैंपियनशिप में 919 अंक का नया रिकार्ड बना कर चैंपियन बने |

19 वर्ष से कम आयु वर्ग में 1983-86 में राष्ट्रीय जूनियर चैंपियनशिप में चैंपियन बने ।

1984 तथा 85 में लॉयड बैंक जूनियर प्रतियोगिता (दोनों वर्ष) जीती |

1984 व 1985 में 19 वर्ष से कम आयु वर्ग में चैंपियनशिप जीती । 15 वर्ष की आयु में अन्तर्राष्ट्रीय मास्टर बनने का गौरव हासिल किया | वह इतनी कम आयु में यह सम्मान पाने वाले प्रथम सबसे युवा एशियाई बने |

1986 से 88 तक राष्ट्रीय ‘ए’ क्लास शतरंज चैंपियनशिप में तीन वर्ष विजेता रहकर सबसे युवा राष्ट्रीय चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया |

1987 में एलो (ई एल ओ )रेटिंग में द्वितीय स्थान पाया और इसी वर्ष अपना दूसरा ग्रैंड मास्टर नाम प्राप्त किया |

1992 में रेगियो एमिला शतरंज टूर्नामेंट में चैंपियन बने | रेगियो एमिला में कास्परोव से आगे रह कर प्रथम स्थान पाया । यह तब तक का सबसे जबरदस्त मुकाबला था ।

1996 में प्रतिष्ठित डार्टमंड टूर्नामेंट जीत कर क्रामनिक के साथ सयुंक्त विजेता बने । इसी वर्ष स्विस रेपिड शतरंज ग्रांड प्रिक्स, जेनेवा में विश्व चैंपियन गैरी कास्परोव को फाइनल में हरा कर चैंपियन बने ।

1997 में नॉक आउट चैंपियनशिप, ग्रोनिंजेन में चैंपियन बने | यह विश्व चैंपियनशिप का फाइनल मुकाबला था । जिसमें उन्होंने 10 में से 3 खिलाड़ियों को हराया | ये खिलाड़ी थे-शिरोव, जेलफेंड तथा एडम्स ।

1998 में आनदं विश्व के नम्बर दो खिलाड़ी बन गए | फिडे रेटिंग में उन्हें 2790 अंक मिले ।

1988 में मास्को में आनदं ने 1997 का शतरंज का ‘आस्कर’ पुरस्कार जीता |

1998 में टारनियो मैजीट्रल कम्युनिदाद डी मैड्रिड में आनन्द चैंपियन बने । अपने कैरियर की सर्वाधिक एलो रेटिंग 2895 प्राप्त की | तब तक सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले गैरी कास्परोव ने 2800 अंक पाए थे जिससे आनन्द मात्र 5 अंक पीछे रह गए ।

1999 में लगातार दूसरी बार शतरंज का ‘आस्कर’ जीता |

वर्ष 2000 में फिडे विश्व चैंपियनशिप, तेहरान व नई दिल्ली में आनदं ‘विश्व चैंपियन’ बने । इसमें उन्होंने अलेक्सेई शिरोव को फाइनल मुकाबले में 3.5-0.5 से हरा कर नया कीर्तिमान बनाया ।

2001 में ”डुअल ऑफ चैंपियन्स” में वह चैंपियन बने ।

2002 में यूरोटेल विश्व शतरंज ट्राफी, प्राग में आनदं चैंपियन बने ।

2002 में ‘रूस तथा रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड’ टीम के अगुआ रह कर इस अनोखे में टीम को ऐतिहासिक विजय दिलाई |

2002 में विश्व कप हैदराबाद तथा छठे कोर्सिका मास्टर्स रेपिड शतरंज टूर्नामेंट, कोर्सिका में चैंपियन बने | इस दूसरे टूर्नामेंट में अनातोली कार्पोव को 4-2 से हराया ।

2003 में कोरस शतरंज टूर्नामेंट विज्क आन जी में चैंपियन बने | इसी वर्ष 12वें अम्बर शतरंज टूर्नामेंट, मोंटेकार्लो में भी चैंपियन रहे |

2003 में ही रोपिड शतरंज क्लासिक, मैन्ज में चैंपियन बने | कोर्सिका मास्टर्स, बस्तिया में भी चैंपियन बने |

2004 में कोरस शतरंज टूर्नामेंट, विज्क आन जी में चैंपियन घोषित हुए | 1989,1998 और 2002 के बाद आनदं की विज्क आन जी में यह चौथी विजय थी |

2004 में विश्व चैपियनों की टक्कर यानी मैन्ज चेस क्लासिक (जर्मनी) की मुख्य स्पर्धा में लगातार चौथी बार यह खिताब जीतने में सफल रहे | सुपर ग्रैंड मास्टर आनंद की यह रिकार्ड सातवीं जीत थी । 2000 में ही आनन्द ने जर्मन में डार्ट मङं खिताब जीता था |

जनवरी 2006 में सुपर ग्रैंड मास्टर विश्वनाथन आनदं ने कोरस शतरंज चैंपियनशिप का खिताब रिकार्ड पांचवी बार जीता | उन्होंने इजरायल के ग्रैंड मास्टर बोरत गोलफांद को हरा कर यह खिताब अर्जित किया । चूंकि विश्व चैंपियन वेसलीन तोपालोव के अंक आनदं के समान थे, अत: यह खिताब तोपालोव के साथ उन्हें सयुंक्त रूप से प्राप्त हुआ ।

अगस्त 2005 में विश्वनाथन आनदं ने ‘मैन्ज चेस क्लासिक टूर्नामेंट’ में 5-3 से विजय प्राप्त कर पांचवी बार मैन्ज टाइटल जीता । उन्होंने रूसी खिलाड़ी अलेक्जेडंर ग्रिशुक को दो निर्णायक मैचों में हराया |

अगस्त 2006 में आनदं ने मैन्ज चेस क्लासिक चैंपियनशिप में विजय प्राप्त कर लगातार छठी बार और कुल मिलाकर सातवीं बार खिताब हासिल किया । उन्होने अजरबैजान के राद्जाबोव को 5-3 से हराकर यह खिताब प्राप्त किया | यह विश्व रैपिड शतरंज चैंपियनशिप का आनदं का रिकार्ड नौवां खिताब था | इस खेल के पंडितों के अनुसार भविष्य में किसी भी खिलाड़ी के लिए इस रिकार्ड को तोड़ना बहुत कठिन होगा |

मार्च 2007 में आनदं शतरंज की तीनों बड़ी प्रतियोगिताओं (कोरसा, लिनारेस और डार्टमडं) का खिताब जीतने वाले एकमात्र खिलाड़ी बन गए |

1995 में आनदं को शतरंज का बेहतरीन खिलाड़ी होने के नाते ‘अर्जुन पुरस्कार’ दिया गया |

1987 में शान्ति और दोस्ती बढ़ाने के लिए ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’ दिया गया ।

1987 में आनदं को ‘पद्मश्री’ दिया गया | वह इस सम्मान को पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे |

1987 में शतरंज के खेल में अपने बेहतरीन योगदान के लिए आनदं को ‘नेशनल सिटीजन अवार्ड’ दिया गया |

1988 में जवाहरलाल टेक्नोलाजिकल विश्वविद्यालय हैदराबाद की ओर से मानद डाक्टरेट ‘कला प्रवीण’ उपाधि दी गई |

1991-92 में आनदं को ‘राजीव गांधी खेल रत्न’ पुरस्कार दिया गया |

1995 में उन्हें के.के. बिरला पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया ।

1998 में ‘ब्रिटिश चेस फेडरेशन’ द्वारा ‘बुक ऑफ द ईयर’ पुरस्कार उन्हें दिया गया | यह उनकी पुस्तक ‘विशी आनदं – माइ बेस्ट गेम्स ऑफ चेस’ के लिए प्रदान किया गया |

1998 में भारत की खेलों की पत्रिका ‘स्पोर्टस स्टार’ की ओर से ‘मिलेनियम का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी’ के रूप में आनदं को सम्मानित किया गया |

वर्ष 2000 में आनदं को ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया | यह सम्मान उन्हें विश्व चैंपियनशिप में प्रथम एशियाई विजेता होने के पुरस्कार स्वरूप दिया गया ।

विश्वनाथन आनंद को हीरो होंडा स्पोर्ट्स अकादमी द्वारा वर्ष 2004 के लिए शतरंज के श्रेष्ठतम खिलाड़ी के लिए नामांकित किया गया ।

वर्ष 2007 में मैक्सिको में आयोजित ग्लोबल टूर्नामेंट में खेलते हुए विश्वनाथन आनदं ने चौदहवें राउण्ड में हंगरी के पीटर लेको को पराजित किया और विश्वविजेता बने |

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